सिंधु जल बंटवारे को बढ़ रहा टकराव

पोलखोल न्यूज़ 3/30/2017 2:12:24 AM
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सिंधु जल बंटवारे को लेकर बने भारत-पाकिस्तान स्थायी सिंधु आयोग की इस्लामाबाद में हुई बैठक से उम्मीद बंधी थी कि दोनों देशों के बीच संबंधों में लंबे समय से जमीं बर्फ पिघल सकती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनों की पालना में दोनों देशों के बीच भावनात्मक टकराव भी आड़े आते दिख रहे हैं। लंबे समय से प्रतीक्षारत भारत-पाकिस्तान स्थायी सिंधु आयोग (पीआईसी) की बैठक गत सप्ताह इस्लामाबाद में हुई। इसे पाकिस्तान के राजनेताओं व जनरलों के हाल ही में बातचीत फिर शुरू करने और चीन-पाकिस्तान अर्थिक कारिडोर परियोजना में भारत के शामिल होने के बयानों के संदर्भ में लगा कि भारत-पाक संबंधों में लम्बे समय से जमीं बर्फ पिघल सकती है। दोनों देशों में इस बैठक के एजेण्डा को लेकर भी सहमति नजर आई। निर्धारित एजेंडे में तीन प्रमुख मुद्दे थे। पहला-भारत की पालकदुल, मियार और कलनई पनबिजली परियोजनाएं, दूसरा-जलबहाव के आंकड़े पाकिस्तान के साथ साझा करना, तीसरा-भारत के विशेषज्ञों का नियत स्थलों का दौरा। भारतीय पक्ष, आने वाले बरसाती मौसम से ही जलबहाव के आंकड़े साझा करने पर सहमत भी हो गया था। प्रारंभिक स्तर पर माहौल सौहार्दपूर्ण नजर आया। लेकिन भारत-पाकिस्तान के उलझे इतिहास और समय-समय पर भावुकतापूर्ण नजरिए के कारण बैठक के बाद के बयानों ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पाकिस्तान के जल व ऊर्जा मंत्री ख्वाजा आसिफ जो रक्षा मंत्री भी हैं, ने बयान में कहा कि भारत मियार परियोजना का काम रोकने, अगस्त तक पाक सिंधु आयोग को मौका मुआयना करने और विश्व बैंक की मध्यस्थता में वाशिंगटन में अगले माह तीन दिवसीय बैठक पर सहमत हो गया है। भारत ने न सिर्फ पाक के इन दावों का खंडन किया बल्कि पाकिस्तान को जल बंटवारे समझौते का अंतरराष्ट्रीयकरण करने पर भी आड़े हाथों लिया। भारत ने विश्व बैंक को भी निशाना बनाते हुए कहा कि विश्व बैंक की मध्यस्थता में वाशिंगटन में बुलाई गई ऐसी कोई बैठक आईडब्ल्यूटी (इंडस वाटर ट्रीटी) की भावना के खिलाफ होगी। पाकिस्तान की समस्याएं तब शुरू हुई जब 2007 में भारत ने 86 करोड़ की किशनगंगा पनबिजली परियोजना शुरू की जो पिछले साल ही पूरी होनी थी। पाकिस्तान वर्ष 2010 में इस मामले को आईडब्ल्यूटी के प्रावधानों के उल्लंघन का अरोप लगाकर अंतरराष्ट्रीय पंचाट में ले गया था। 2013 में अंतरराष्ट्रीय पंचाट ने भारत के पक्ष में फैसला देते हुए परियोजना का काम चालू रखने की इस शर्त पर अनुमति दी कि समय-समय पर आईडब्ल्यूटी के प्रावधानों के अनुरूप न्यूनतम जलप्रवाह होता रहे। 2013 में भारत ने चेनाब पर 850 मेगावाट की रेटल पनबिजली परियोजना का काम प्रारंभ किया तो पाकिस्तान ने फिर आपत्ति जताई। इसी परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान ने जनवरी 2015 में सिंधु आयोग की 111वीं बैठक को पूरी तरफ विफल बताते हुए कहा कि दोनों देश रेटल व किशनगंगा परियोजना पर किसी सहमति पर नहीं पहुंच पाए हैं। यही स्थिति मई 2015 में दिल्ली में हुई सिंधु आयोग की 112 वीं बैठक में रही जिसमें पाकिस्तान ने पाकल दुल, मियार व कलनाई पनबिजली परियोजनाओं पर आपत्ति जताई। ऐसे ही प्रतिकूल वातावरण के चलते लगभग दो वर्ष तक सिंधु आयोग की बैठक नहीं हो पाई। इस बीच जनवरी 2016 में पाक संसद की रक्षा, ऊर्जा और जल कमेटी ने प्रस्ताव पास कर आईडब्ल्यूटी पर विश्व बैंक से कोर्ट आफ आर्बिटेशन बनाने की दरख्वास्त की। भारत का मानना है कि आईडब्ल्यूटी संधि विश्व बैंक को सिर्फ फेसिलेटेट करने का निर्देश देता है न कि मध्यस्थता का अधिकार। गत वर्ष जुलाई में दिल्ली में जल सचिव स्तरीय वार्ता में आईडब्ल्यूटी के प्रावधानों के अनुसार मुद्दे को निष्पक्ष तीसरे पक्ष को देने पर भी सहमति बनी। लेकिन 19 सितंबर को उरी आतंकी हमले ने भारतीय जनमानस को आक्रोशित कर दिया जिससे पूरी प्रक्रिया पर गाज गिरी। नई दिल्ली में 29 सितम्बर को आईडब्ल्यूटी की बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बयान दिया-खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते। ऐसी खबरें आने लगी कि सरकार समूची आईडब्ल्यूटी व्यवस्था को रद्द कर सकती है। प्रतिउत्तर में पाकिस्तान ने कहा कि ऐसी किसी भी कार्रवाई को वह युद्ध की घोषणा समझेगा। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में विश्व बैंक ने 12 दिसंबर को दो समानांतर प्रक्रियाओं (निष्पक्ष विशेषज्ञ व पंचाट) को खारिज करते हुए दोनों देशों से आग्रह किया कि वे दोनों देशों के जल सचिवों की बैठक आयोजित कर ऐसी प्रकियाएं अपनाएं जिससे ऐसे जटिल मुद्दों का हल निकल सके। इसी पृष्ठभूमि में पीआईसी की इस्लामाबाद में गत सप्ताह बैठक हुई थी। जल बंटवारे की समस्या का मूल कारण सिंधु जल समझौते के तहत पाकिस्तान को दी गई पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चेनाब) पर भारत की पनबिजली परियोजनाओं के प्रति पाकिस्तान का शंकित होना है। दूसरी ओर भारत का मानना है कि यह समझौता पाकिस्तान के ज्यादा अनुकूल है। उल्लेखनीय है कि 4 मई, 1948 को हुए समझौते के तहत पाकिस्तान को भारत के जल छोड़ने के एवज में मुआवजा चुकाने की बात थी। हालांकि, इसके बाद विश्व बैंक की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच आईडब्ल्यूटी का मौजूदा स्वरूप सामने आया। बड़ी समस्या यह भी है कि ये सब नदियां विवादास्पद जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में बहती हैं। दोनों पक्ष पानी के इस बहाव को अपने खोये हुए क्षेत्र को पुनरू पाने के अरमानों के रूप में देखते हैं जो जल समझौते के प्रति उनके नजरिये को पूर्णतरू बदल देती है। दोनों पक्ष क्षेत्र से जुड़े भावनात्मक लगाव के चलते यह समझने में विफल हैं कि बहुराष्ट्रीय नदियां बहते हुए संसाधन है जिनके बंटवारे में अंतरराष्ट्रीय नियमों एवं कानूनों का सख्ती से पालन होना चाहिए।

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