अफसरों ने गरीबों की योजनाओं के पैसे को किया इधर-उधर खर्च

विपुल अग्रवाल, पोलखोल न्यूज़, देहरादून 4/8/2017 11:06:16 PM
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योजनाओं के मद में जारी किए गए करोड़ों रुपये पात्रों पर खर्च करने के बजाए निगम के अफसरों ने पैसे की एफडी कर दी और साल दर साल इससे मिलने वाली ब्याज की रकम को अनाप-शनाप खर्चों में लुटाते रहे। कायदे से निगम को अनुदान की अवशेष राशि का पाई-पाई सरकार को लौटाना था। उत्तराखंड बहुउद्देश्यीय वित्त विकास निगम में गरीब, कमजोर और निर्बल वर्ग की योजनाओं की करोड़ों की राशि पर सालों से सूदखोरी का खेल पकड़ में आया है। हाल यह रहा कि 2010-11 में ब्याज की कमाई से निगम को 261.63 लाख रुपए मिले थे। इसमें से 230.75 लाख रुपए दफ्तर पर ही खर्च कर दिए गए। इसी तरह 2009-10 में निगम ने ब्याज से 297.28 करोड़ रुपए कमाए और इसमें से 118.05 लाख रुपए दफ्तर पर खर्च कर दिए।सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मिली जानकारी के मुताबिक 2004-2012 के दौरान इस योजना के तहत 9.32 करोड़ रुपए एससी और 7.36 करोड़ रुपए एसटी वर्ग के लिए निगम को दिए गए। निगम ने 16.68 करोड़ रुपए की इस राशि में से 7.10 करोड़ रुपए की राशि बैंकों में एफडी बनाकर जमा रखी और इसके ब्याज से कर्मचारियों को वेतन दिया और बैठकों पर इस राशि को खर्च किया।इसके लिए न तो सरकार से अनुमति ली गई और न ही निगम के निदेशक मंडल से अनुमोदन लिया गया। अब महालेखा परीक्षा ने इस गंभीर वित्तीय धांधली से पर्दा उठाया है। वर्ष 2002-2015 के बीच विभिन्न योजनाओं में उत्तराखंड बहुउद्देश्यीय वित्त विकास निगम को मिली अनुदान राशि का करीब 732.24 करोड़ रुपए की एफडी की गई। इस एफडी से करीब 37.73 करोड़ रुपए निगम ने ब्याज के तौर पर अर्जित किए। महालेखा परीक्षक का कहना है कि 2012- 2016 तक की आडिट की प्रक्रिया जारी है। समाज कल्याण मंत्री यशपाल आर्य ने कहा कि योजना की राशि यदि पात्रों पर खर्च होने की बजाय बैंकों में जमा की जा रही है तो ये बेहद गंभीर मामला है। पूरे मामले का परीक्षण कराया जाएगा। महालेखा परीक्षा की रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया जाएगा। निगम के डीजीएम एसएस रावत के मुताबिक योजनाओं का पैसा कुछ अवधि के लिए एफडी बनाकर रखा गया, लेकिन इससे कोई योजना प्रभावित नहीं हुई। योजनाओं की जो राशि बच गई, उसे बैंक में रखने से सिर्फ चार प्रतिशत ब्याज मिलता, इसलिए एफडी बनाई गई ताकि ब्याज ज्यादा मिले।

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