मनरेगा में हुए लाखों के घोटाले में ग्राम विकास अधिकारी गिरफ्तार

भाष्कर जोशी, पोलखोल न्यूज,देहरादून 4/10/2017 11:13:35 PM
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गल्जवाडी में मनरेगा में हुए लाखों के घोटाले में पुलिस ने ग्राम विकास अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में अब तत्कालीन खंड विकास अधिकारी और गांव प्रधान लीला शर्मा पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है। पुलिस की विवेचना में तार जाल के फर्जी बिल लगाकर सरकारी धन के दुरूप्रयोग की पुष्टि हुई है। सरकारी रिकार्ड में हेरीफेरी कर गबन का यह मामला राष्ट्रपति शासन में दर्ज हुआ था, लेकिन सरकार बदलते ही विवेचना में तेजी आ गई। राष्ट्रपति शासन के दौरान पांच मई 2016 को गौतम प्रकाश शर्मा ने कैंट कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया था कि गांव प्रधान और कांग्रेस नेत्री लीला शर्मा और ग्राम पंचायत अधिकारी तपेन्द्र सिंह राणा ने फर्जी बिल बाउचर लगाकर मनरेगा के तहत लाखों का गबन कर लिया है। प्रधान लीला शर्मा को हाईकोर्ट की शरण लेने पर राहत मिल गई थी। हाईकोर्ट ने प्रधान को विवेचना में सहयोग करने के आदेश दिए थे। इसी बीच प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ तो गबन के इस मामले की विवेचना में तेजी आ गई। एक सप्ताह पहले पुलिस प्रधान से दस्तावेज लेने गई थी तो मामला गरमा गया। प्रधान लीला शर्मा के पुलिस पर उत्पीड़न के आरोप लगाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय उनके समर्थन में कैंट कोतवाली पहुंच गए, जहां पर काफी देर तक हंगामा हुआ था। विवेचना में महिला उप निरीक्षक को रखने के आश्वासन पर यह लोग शांत हुए थे। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्वीटी अग्रवाल ने बताया कि मनरेगा योजना के तहत 2009 से लेकर 2011 के बीच चार योजनाओं के तहत गल्जवाड़ी में तार जाल का काम कराया गया था। विवेचना में इनके द्वारा फर्जी बिल लगाकर सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि हुई है। उसी आधार पर ग्राम विकास अधिकारी तपेन्द्र सिंह राणा (फिलहाल डोईवाला में तैनाती) को गिरफ्तार कर लिया है। दोपहर बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। उन्होंने बताया कि मुकदमे में साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की धारा बढ़ाई गई है। फोरेंसिक जांच में इस बात की पुष्टि हुई है। पुलिस विवेचना के दौरान मनरेगा योजना से संबधित बैंक खाते से आरोपियों द्वारा नियम विरुद्ध रकम निकाले जाने की बात सामने आई है। मनरेगा घोटाले में पुलिस विवेचना में बेहद दिलचस्प तथ्य सामने आया है। एसएसपी स्वीटी अग्रवाल की माने तो विवेचना के दौरान पाया गया कि 2009 में जिन फर्मों के बिल बाउचर लगाए गए थे। उन फर्मों का पंजीकरण 2012 में होने की बात सामने आई है। प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी के कब्जे में मिले अभिलेखों में छेड़छाड़ किए जाने की बात पुष्टि हुई है।

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