कुछ परिस्थितियों में निचली अदालतें छह महीने की न्यूनतम अवधि में ढील दे सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट

पोलखोल न्यूज़, नई दिल्ली 9/12/2017 10:58:27 PM
img

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिंदू कानून के तहत तलाक की मंजूरी देने के लिए तय की गई न्यूनतम छह महीने की सुलह की अवधि को निचली अदालत माफ कर सकती हैं, बशर्ते अलग-अलग रह रहे पति-पत्नी में सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची हो| साल 1955 के हिंदू विवाह कानून में प्रावधान है कि यदि कोई दंपति आपसी सहमति से तलाक लेने की अर्जी दायर करता है तो उस अर्जी को दायर करने की तारीख और अदालत की ओर से तलाक मंजूर किए जाने की तारीख के बीच न्यूनतम छह महीने का वक्त दिया जाता है ताकि दंपति सुलह की संभावनाएं तलाश सकें| न्यायमूर्ति ए के गोयल और न्यायमूर्ति यू यू ललित ने कहा कि उनकी राय है कि धारा 13बी (2) में लिखित अवधि आवश्यक नहीं बल्कि निर्देशात्मक है| ऐसे हर मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों में अदालतों के पास अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करने का विकल्प खुला रहेगा| न्यायालय ने कहा कि कुछ परिस्थितियों में निचली अदालतें छह महीने की न्यूनतम अवधि में ढील दे सकती हैं और तलाक मांग रहा दंपति इस अवधि में ढील की अर्जी दायर कर सकता है| तलाक की अर्जी दायर करने के बाद ही वह ऐसा कर सकते हैं| शीर्ष न्यायालय ने कहा कि ऐसी कार्यवाहियों के संचालन में निचली अदालत वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम का इस्तेमाल कर सकती है| पीठ अलग-अलग रह रहे एक दंपति से जुड़ी अर्जी पर सुनवाई कर रही थी| दंपति ने इस आधार पर छह महीने की सुलह की अवधि में ढील देने की मांग की थी कि वे पिछले आठ साल से अलग-अलग रह रहे हैं और उनके बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं है| 

Advertisement

img
img