हम लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं: शरद यादव

पोलखोल न्यूज़, नई दिल्ली 11/2/2017 12:58:14 AM
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जदयू नेता शरद यादव की राज्यसभा में सदस्यता को खतरा बना हुआ है, लेकिन उनके तेवर में कोई फर्क नहीं है| वे 11 बार के सांसद और 15 बार इलेक्शन लड़कर संसद में अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं, लेकिन अब नीतीश और उनकी राह में आए अलगाव ने उनकी सदस्यता को संकट में ला दिया है| इसके बावजूद भी वह बहुत संतुलित है और कहते हैं कि ये क़ानूनी मामला है जिसे उनके वकील लड़ रहे हैं| शरद यादव ने कहा कि उनका मकसद राज्यसभा में बने रहना नहीं है| वे जनता की तकलीफ को समझ रहे हैं और जनता के लिए ही जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं| शरद यादव ने कहा कि बिहार की जनता को धोखा देकर भाजपा के साथ जा मिले हमारे पुरानी साथी हमारी राज्यसभा की सदस्यता समाप्त करने के लिए और राज्यसभा के सभापति पर, प्रधानमंत्री और भाजपा नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं| इस बारे में मेरा इतना ही कहना है कि पार्टी और विचारधारा हमने नहीं, उन लोगों ने छोड़ी हैं| हम तो आज भी वहीं हैं जहां पहले थे| उन्होंने कहा  हम लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं| इस लडाई में मैं राज्यसभा की सदस्यता को बहुत छोटी चीज मानता हूं| लेकिन इसके बावजूद अगर किसी तरह के दबाव में आकर हमारी राज्यसभा की सदस्यता खत्म की जाती है तो इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना होगा| इस देश ने ऐसे प्रयासों को और उसके परिणामों को पहले भी देखा है, जब इंदिरा गांधी की लोकसभा की सदस्यता हमारी जनता पार्टी की सरकार ने ही अपने बहुमत के बल पर खत्म कर दी थी, जिसके चलते सत्ता में उनकी वापसी आसान हो गई थी| शरद यादव ने कहा कि हम जन आंदोलन छोड़ चुके हैं| साझी विरासत के बाद देश में विपक्ष की धार तेज हो गई है| 22 राजनीतिक दल एक साथ एक मंच पर आ चुके हैं| ये हमारी बड़ी जीत है| उन्होंने कहा कि ये बात अलग है कि हमारे इस विरोध को जनता का समर्थन मिल रहा है लेकिन मीडिया में इसे उस तरह नहीं दिखाया जा रहा| वे आरोप लगाते हैं कि हम डटकर अघोषित इमरजेंसी का सामना कर रहे हैं| इस पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी वे नहीं करते और कहते हैं कि इसका जवाब हम नहीं जनता देगी| जो वादा हमने बिहार की 11 करोड़ जनता से किया था उसे किसने तोड़ा है? उस अमानत में खयानत किसने की है| पूरा देश देख रहा है और इसका जवाब भी आने वाले समय में जनता देगी| यादव ने कहा कि हमने तो अपने पार्टी ऑफिस, मंत्रीपद का ऑफर, कई कमेटियों की चेयरमैनशीप सबकुछ छोड़ा है| साल 1977 की इमरजेंसी में लोकसभा की सदस्यता तक छोड़ी है लेकिन इसका जिक्र नहीं हुआ है| वजह ये है कि एक पूर्वाग्रह है| उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई इस देश के दलितों और अल्पसंख्यक वर्ग के लिए है| उनके अधिकारों के लिए वे लड़ते रहेंगे| उन्हें राज्यसभा से बेदखल करने का मतलब इस वर्ग की आवाज को दबाना है| इसको कुचलना है| 

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