भाजपा ने की 2019 का रण जीतने की रणनीति तय, काशी से होगा युवा उद्घोष का आगाज

पोलखोल न्यूज़ 1/8/2018 2:55:04 AM
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2019 के आम चुनावों में अभी एक साल से ज्यादा का वक्त बचा है। लेकिन राजनीतिक दलों की तरफ से तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। सत्ता पक्ष यानि भाजपा लोगों के बीच अपने क्रांतिकारी फैसलों के बारे में बता रही है। वहीं विपक्ष यानि कांग्रेस सरकार की नाकाम नीतियों को जनता के बीच सामने रख रही है। इन सबके बीच एक ऐसा मतदाता समूह यानि युवा मतदाताओं का समूह है जिस पर दोनों दलों की नजर टिकी है। खास तौर से भाजपा उन मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित कर रही है जो 2018 में 18 वर्ष के हो जाएंगे।2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा की चल रही तैयारी का यूथ ब्रिगेड अहम हिस्सा होंगे। ऐसे युवा जिनकी उम्र अभी 17 वर्ष है और वे लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट डालेंगे। इस महाअभियान की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र से होने जा रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 20 जनवरी को ‘युवा उद्घोष’ आयोजन से इस मिशन का आगाज करेंगे।

1776 बूथ पर 10-10 युवाओं की तैनाती
कार्यक्रम के तहत संगठन के कार्यकर्ताओं के अलावा बनारस के सभी 1776 बूथ पर दस-दस युवाओं की तैनाती की जा रही है। यह ऐसे युवा हैं जो अभी तक भाजपा के सीधे कार्यकर्ता नहीं थे। सभी का बाकायदे डिजिटल माध्यम से पंजीकरण कराया जा रहा है। अभी तक करीब दस हजार युवाओं का पंजीकरण हो चुका है। लक्ष्य के मुताबिक 17 हजार से अधिक युवाओं की भागीदारी 20 जनवरी के आयोजन में होनी है।

काशी से युवा उद्घोष का होगा आगाज
पार्टी सूत्रों का कहना है कि बनारस से युवा उद्घोष का आगाज होने के बाद संगठन ने ऐसी कवायद जोरशोर से पूरे देश में करने का विचार बनाया है। आयोजन के दौरान युवाओं को संगठन साहित्य आदि भी वितरित होगा। यूथ ब्रिगेड के तहत प्राथमिकता तो ऐसे 17 वर्ष के युवाओं पर है जो पहली बार 2019 में वोट देंगे। प्रत्येक बूथ पर दस यूथ के लक्ष्य के लिए इस उम्र सीमा में थोड़ी गुंजाइश भी रखी गई है कि जरूरत के हिसाब से 35 वर्ष तक के युवाओं को जोड़कर टीम तैयार की जाए।

पीएम के काशी आगमन की तैयारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपने संसदीय क्षेत्र बनारस में आने को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। सूत्र बताते हैं कि यदि तैयारी बढ़िया हुई तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ पीएम भी 20 जनवरी को बनारस में हो सकते हैं। यदि ऐसा न हुआ तो इसी माह के अंत या फरवरी के पहले पखवारे में मोदी बनारस आएंगे।

जानकार की राय
दैनिक जागरण से खास बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने कहा कि युवा मतदाताओं पर फोकस तो तभी दलों को होना चाहिये। राजनीतिक दलों को ये समझने की जरूरत है कि उनकी पसंद क्या है। बड़ी बात ये है कि युवाओं के मन को पढ़ने की पहल भाजपा ने की है। इससे पहले 2014 के आम चुनाव के दौरान भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बेहतर ढंग से कर चुके थे। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सम्मेलन में वो अपने सांसदों और पदाधिकारियों से कह भी चुके हैं कि अगला चुनाव अब मोबाइल पर लड़ा जाएगा। 

2017 यूपी विधानसभा चुनाव और युवा मतदाता
चुनाव आयोग के अनुसार उत्तर प्रदेश में 55.76 प्रतिशत वोटर युवा है। 2017 में विधानसभा के चुनाव में युवा वोटरों की जिम्मेदारी अहम रही। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि भारत समेत दुनिया के 11 देशों की आबादी ही 10 करोड़ से अधिक है। जबकि अकेले उत्तर प्रदेश की आबादी 20 करोड़ से ज्यादा है। उत्तर प्रदेश को अगर अलग देश की तरह देखा जाए तो यह दुनिया का पांचवां सबसे ज्यादा आबादी वाला है। ऐसे में यहां आधे से ज्यादा युवा वोटरों के चलते चुनाव में उनकी भूमिका भी बढ़ जाती है।

2014 आम चुनाव में दो करोड़ 30 लाख थे युवा मतदाता

2014 के आम चुनाव में 81 करोड़ 45 लाख मतदाता मत देने के अधिकारी थे। इस दफा 10 करोड़ मतदाता बढ़े जिनमें दो करोड़ तीस लाख मतदाता 18-19 आयु वर्ग में थे। 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस को 11.9 करोड़ मत मिले थे। जबकि भाजपा को 7.8 करोड़ मत। बहुजन समाज पार्टी को 2.6 करोड़ मत और सीपीएम को 2.2 करोड़ मत हासिल हुए। माना जा रहा है कि 2019 के चुनाव में वो मतदाता ज्यादा प्रभाव डालेंगे जिनका जन्म साल 2000 में हुआ था। ये मतदाता वर्ग है जिसने ऐसे भारत में आंखें खोलीं जो तरक्की की राह पर था। पहली बार 18 से 22 साल के आयुवर्ग का मतदाता बहुत बड़ा राजनीतिक बदलाव लाने वाले हैं। जानकारों का कहना है कि वो किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव हरा और जिता सकते हैं। इसके पीछे वजह है कि ऐसे मतदाताओं की संख्या उतनी ही है जितने मत पाकर कांग्रेस ने 2009 आम चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं और दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने में कामयाब रही। 
युवा मत एक पार्टी को एकतरफा नहीं मिले
एक अध्ययन के मुताबिक युवाओं ने कभी किसी भी राजनीतिक दल के लिए पक्ष में जमकर वोट नहीं किया है। यह हकीकत कम से कम पिछले पांच आम चुनावों 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के दौरान साफ नजर आया है। युवा मतदाता हमेशा से विभिन्न राजनीतिक दलों में विभाजित होते रहे हैं।  दोनों राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस को एक समान अनुपात में युवाओं के मत मिले हैं। 1999 में भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव के दौरान युवाओं के ज्यादा मत मिले थे। लेकिन इसके बाद पार्टी युवाओं के विश्वास को हासिल नहीं कर पाई। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रदीप सिंह ने कहा कि किसी पार्टी का नेतृत्व अगर युवा हो को इसका अर्थ ये नहीं है कि युवा उस दल को अपना मत देंगे। अगर ऐसा हुआ तो राहुल गांधी के रहते कांग्रेस को बेहतर कामयाबी मिलती। क्योंकि वो खुद बार बार अपने आप को युवाओं से लिंक करते हैं। इसके साथ ही अाप जेपी आंदोलन को देखें तो पाएंगे कि जेपी की बुजुर्ग थे लेकिन उनकी एक पुकार पर लाखों की संख्या में युवा उनके पीछे चलने को तैयार थे। यहीं नहीं दिल्ली में रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के आंदोलव को कौन भूल सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में लाखों की संख्या में युवा उनके साथ हो लिए। दरअसल युवाओं को अपना भविष्य दिखाई दे रहा है। उनकी आकांक्षा रहती है कि कौन सा दल उनके बेहतरी के लिए काम करेगा। इससे भी बड़ी बात है कि 2000 में जो लोग पैदा हुए वो 2018 में 18 वर्ष के हो जाएंगे और उनमें किसी तरह का पूर्वाग्रह नहीं है। उनके लिए इतिहास, वर्तमान को नापने का पैमाना नहीं बन सकता है। इसके साथ ही राष्ट्रवाद की भावना में जिस तरह से उभार देखा जा रहा है उससे आज का युवा वर्ग प्रभावित है।

हिंदी पट्टी में भाजपा का दबदबा रहा कायम
हिंदी पट्टी के इलाकों में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड और हरियाणा के युवाओं का रूझान भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में दिखा था। जबकि दिल्ली में ये रुझान आम आदमी पार्टी के पक्ष में दिखा। इस तरह का कोई रुझान दक्षिण भारत के चार राज्यों में नजर नहीं आया था। और ना ही पूर्व के राज्यों पश्चिम बंगाल,असम और ओडिशा में इस तरह के संकेत मिले। उत्तर पूर्व के राज्यों में भी इस तरह का रुझान देखने को नहीं मिला। 

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